बच्चों से कैसे बात करें? जब बच्चा अपनी बात न बताए तो क्या करें

बच्चों से कैसे बात करें, यह सवाल कई माता-पिता के मन में आता है। खासकर तब, जब बच्चा पहले की तरह अपनी बात माता-पिता से साझा नहीं करता।

स्कूल में क्या हुआ, किस बात की चिंता है या मन में क्या चल रहा है, बच्चा कई बार कुछ नहीं बताता।

ऐसे समय में बार-बार सवाल पूछना या डांटना हमेशा काम नहीं करता। कई बार बच्चे को सिर्फ यह भरोसा चाहिए होता है कि माता-पिता उसकी बात बिना तुरंत डांटे सुनेंगे।

बच्चों से कैसे बात करें – माता-पिता बच्चे की बात ध्यान से सुनते हुए

बच्चे माता-पिता से अपनी बात क्यों नहीं बताते?

हर बच्चे का स्वभाव अलग होता है। कोई बच्चा आसानी से अपनी बात कह देता है, जबकि कोई बच्चा चुप रहकर अपनी परेशानी अपने तक रखता है।

इसके पीछे कई सामान्य कारण हो सकते हैं:

  • उसे डर हो कि डांट पड़ेगी।
  • पहले उसकी बात को गंभीरता से नहीं लिया गया हो।
  • उसे लगता हो कि उसकी बात समझी नहीं जाएगी।
  • माता-पिता हमेशा जल्दी में रहते हों।
  • छोटी गलती पर भी बहुत गुस्सा किया जाता हो।
  • बच्चा खुद अपनी भावना को समझ नहीं पा रहा हो।

हम अपने आसपास भी देखते हैं कि कई बार बच्चा कुछ बताने आता है, लेकिन बड़े लोग मोबाइल में व्यस्त रहते हैं या तुरंत कह देते हैं, “अभी नहीं, बाद में बताना।”

बच्चे के लिए ऐसे छोटे अनुभव भी मायने रखते हैं।

बच्चे गलती या डर के कारण कई बार सच बताने से भी बच सकते हैं। बच्चों के झूठ बोलने के कारणों को समझने के लिए यह लेख भी पढ़ें।

बच्चों से कैसे बात करें?

बच्चे से बातचीत शुरू करने का सबसे आसान तरीका है कि हम उसे सवालों की मशीन न बना दें।

“आज स्कूल में क्या हुआ?”, “होमवर्क किया?”, “टीचर ने क्या कहा?” जैसे सवाल जरूरी हैं, लेकिन बातचीत केवल सवाल-जवाब तक सीमित नहीं होनी चाहिए।

कभी उसके पास बैठकर सामान्य बात करें। उसके खेल, दोस्त, पसंदीदा कार्टून या स्कूल की किसी मजेदार घटना के बारे में पूछें।

धीरे-धीरे बच्चा महसूस करने लगता है कि माता-पिता केवल गलती पकड़ने के लिए बात नहीं करते।

बच्चों की सही परवरिश में उनकी बात सुनना और उन्हें सम्मान देना भी बहुत जरूरी है। इस बारे में हमने बच्चों की सही परवरिश में विस्तार से बात की है।

उम्र के हिसाब से बच्चों से कैसे बात करें?

हर उम्र में बच्चे की समझ और जरूरत अलग होती है। इसलिए छोटे बच्चे से बात करने का तरीका किशोर बच्चे से अलग रखना बेहतर रहता है।

2 से 5 साल के बच्चे

इस उम्र में बच्चे छोटी और आसान बात जल्दी समझते हैं।

  • छोटे वाक्यों में बात करें।
  • एक समय में एक ही बात समझाएं।
  • कहानी, खेल और उदाहरण का सहारा लें।
  • बच्चे की बात बीच में न काटें।
  • गलती होने पर डराने के बजाय समझाएं।

6 से 9 साल के बच्चे

इस उम्र में बच्चे सवाल पूछने और अपनी पसंद-नापसंद बताने लगते हैं।

  • उनसे स्कूल और दोस्तों के बारे में सामान्य बातचीत करें।
  • उनकी बात को ध्यान से सुनें।
  • हर छोटी गलती पर गुस्सा न करें।
  • उनसे पूछें कि किसी समस्या के बारे में वे क्या सोचते हैं।
  • सही और गलत समझाते समय उदाहरण दें।

10 से 13 साल के बच्चे

इस उम्र में बच्चे अपनी सोच और भावनाओं को लेकर ज्यादा जागरूक होने लगते हैं।

  • उन्हें अपनी राय रखने का मौका दें।
  • हर बात पर आदेश देने के बजाय कारण समझाएं।
  • दोस्तों, स्कूल, पढ़ाई और ऑनलाइन गतिविधियों के बारे में खुलकर बात करें।
  • उनकी निजता का सम्मान करें, लेकिन जरूरी सीमाएं भी समझाएं।
  • अगर बच्चा कोई परेशानी बताए तो पहले पूरी बात सुनें।

14 से 18 साल के किशोर

किशोर उम्र में बच्चे अपने फैसलों और पहचान को लेकर ज्यादा संवेदनशील हो सकते हैं।

  • उनसे छोटे बच्चे की तरह बात न करें।
  • उनकी राय को गंभीरता से सुनें।
  • असहमति होने पर भी तुरंत चिल्लाने या अपमान करने से बचें।
  • पढ़ाई के साथ दोस्ती, रिश्ते, सोशल मीडिया और भविष्य जैसे विषयों पर भी बात करें।
  • उन्हें बताएं कि परेशानी होने पर वे माता-पिता से बात कर सकते हैं।

सबसे जरूरी बात

उम्र चाहे कोई भी हो, बच्चे को यह महसूस होना चाहिए कि उसकी बात सुनी जा रही है।

हर समस्या का जवाब तुरंत देना जरूरी नहीं है। कई बार बच्चे के लिए इतना ही काफी होता है कि माता-पिता कुछ देर शांत होकर उसकी पूरी बात सुनें।

1. बच्चे की बात बीच में न काटें

बच्चों से कैसे बात करें – मां छोटे बच्चे से प्यार से बात करते हुए

जब बच्चा कोई बात बता रहा हो तो उसे पूरा बोलने दें।

कई बार हमें लगता है कि हमें पहले से पता है कि बच्चा क्या कहने वाला है। लेकिन उसकी बात पूरी सुने बिना जवाब देने से बच्चा अगली बार चुप हो सकता है।

अगर बच्चा धीरे-धीरे बोल रहा है, तब भी उसे समय दें।

2. हर बात पर तुरंत डांट न दें

मान लीजिए बच्चे ने स्कूल में हुई कोई गलती आपको बताई।

अगर पहला जवाब ही डांट है, तो अगली बार बच्चा वही बात छिपा सकता है।

इसका मतलब यह नहीं कि गलती पर कुछ कहना ही नहीं चाहिए। पहले पूरी बात समझें, फिर शांत होकर बताएं कि क्या सही था और क्या बेहतर किया जा सकता है।

3. बच्चे की छोटी परेशानी को भी सुनें

बड़ों को किसी बात की चिंता छोटी लग सकती है, लेकिन बच्चे के लिए वही बात बहुत बड़ी हो सकती है।

जैसे किसी दोस्त ने उससे बात नहीं की, शिक्षक ने सबके सामने कुछ कह दिया या खेल में वह हार गया।

ऐसे समय पर “इतनी सी बात है” कहने के बजाय पूछ सकते हैं, “तुम्हें इस बात से बुरा लगा?”

इससे बच्चे को अपनी भावना समझने और बताने में मदद मिल सकती है।

4. बात करते समय मोबाइल दूर रखें

बच्चे से बात करते समय हमारा ध्यान बार-बार फोन पर चला जाए तो उसे महसूस हो सकता है कि उसकी बात उतनी जरूरी नहीं है।

हर बातचीत लंबी होना जरूरी नहीं है।

रोज कुछ मिनट भी ऐसे रखें जब आप केवल बच्चे की बात सुनें और बीच में फोन या दूसरे काम न करें।

बच्चों और मोबाइल के बीच सही संतुलन बनाने के लिए यह लेख भी पढ़ें।

5. बच्चे से केवल पढ़ाई की बात न करें

अगर माता-पिता बच्चे से ज्यादातर पढ़ाई, नंबर, होमवर्क और अनुशासन की ही बात करते हैं, तो बच्चा बातचीत को दबाव से जोड़ सकता है।

कभी उससे पूछें:

  • आज सबसे अच्छी बात क्या हुई?
  • आज किस बात पर हंसी आई?
  • तुम्हें कौन सा खेल पसंद आया?
  • आज किसी दोस्त ने कुछ मजेदार कहा?

ऐसी छोटी बातचीत रिश्ते को सहज बनाती है।

6. बच्चे को अपनी राय रखने दें

हर बात में बच्चे को सिर्फ आदेश देना जरूरी नहीं है।

जहां संभव हो, उससे उसकी राय पूछें। जैसे छुट्टी में क्या करना है, कौन सा खेल खेलना है या कमरे को कैसे व्यवस्थित करना है।

इससे बच्चे को महसूस होता है कि घर में उसकी बात भी सुनी जाती है।

लेकिन राय पूछने का मतलब यह नहीं कि हर फैसला बच्चे की इच्छा के अनुसार ही हो। माता-पिता को जरूरत के अनुसार सही सीमा भी तय करनी चाहिए।

7. बच्चे की बात सुनकर तुरंत फैसला न सुनाएं

अगर बच्चा अपनी कोई परेशानी बताता है तो पहले उसकी पूरी बात समझने की कोशिश करें।

तुरंत “तुम्हारी ही गलती होगी” या “मैंने पहले ही कहा था” जैसी बात कहने से बच्चा अपनी बात आगे बताने से बच सकता है।

पहले पूछें कि आखिर हुआ क्या था।

इसके बाद जरूरत के अनुसार उसे समझाएं और आगे ऐसी स्थिति आने पर क्या किया जा सकता है, इस पर बात करें।

बच्चे से बात करते समय किन बातों से बचें?

बच्चों के साथ बातचीत में कुछ छोटी गलतियां रिश्ते पर असर डाल सकती हैं।

इनसे बचने की कोशिश करें:

  • बच्चे की बात बार-बार बीच में काटना।
  • हर बात पर गुस्सा करना।
  • दूसरे बच्चों से तुलना करना।
  • बच्चे की बात का मजाक बनाना।
  • उसकी परेशानी को छोटा बताना।
  • हर बातचीत को पढ़ाई और नंबर तक सीमित रखना।
  • बच्चे की बात सुने बिना तुरंत दोष देना।

अगर बच्चा फिर भी अपनी बात नहीं बताता तो?

हर बच्चा तुरंत खुलकर बात नहीं करता। कुछ बच्चों को भरोसा बनाने में समय लग सकता है।

ऐसे में लगातार सवाल करने के बजाय उसके साथ समय बिताना ज्यादा मददगार हो सकता है।

साथ में खाना खाना, टहलना, खेलना या कोई छोटा घरेलू काम करना भी बातचीत का अच्छा मौका बन सकता है।

कई बार बच्चा आम बातचीत के दौरान ही अचानक अपनी असली परेशानी बता देता है।

बच्चों से बात करने का सबसे जरूरी तरीका

बच्चे को यह महसूस होना चाहिए कि माता-पिता केवल उसकी गलतियां देखने के लिए उसके पास नहीं हैं।

उसे यह भरोसा होना चाहिए कि वह कोई परेशानी, डर या गलती होने पर घर में किसी भरोसेमंद व्यक्ति से बात कर सकता है।

हम माता-पिता के रूप में हर समस्या का समाधान तुरंत नहीं कर सकते, लेकिन बच्चे की बात ध्यान से सुनना हमारे हाथ में जरूर है।

बच्चों के साथ बातचीत और उनकी बात ध्यान से सुनने के बारे में CDC की जानकारी भी पढ़ सकते हैं।

निष्कर्ष

बच्चों से कैसे बात करें, इसका सबसे अच्छा तरीका है कि हम उनकी बात ध्यान से सुनें और उन्हें अपनी बात कहने का मौका दें।

बच्चों से अच्छी बातचीत किसी एक दिन में नहीं बनती। इसके लिए रोज थोड़ा समय, धैर्य और बच्चे की बात सुनने की आदत जरूरी है।

जब बच्चा देखता है कि उसकी बात को बिना मजाक उड़ाए और बिना तुरंत डांटे सुना जाता है, तो उसके लिए अपनी भावनाएं और परेशानियां बताना आसान हो सकता है।

इसलिए बच्चों से बात करने का सबसे अच्छा तरीका केवल ज्यादा बोलना नहीं, बल्कि उनकी बात को ध्यान से सुनना भी है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

1. बच्चों से कैसे बात करनी चाहिए?

बच्चों से शांत होकर, उनकी उम्र और समझ के अनुसार बात करनी चाहिए। उनकी बात पूरी सुनना और हर बात पर तुरंत डांटने से बचना भी जरूरी है।

2. बच्चा अपनी बात माता-पिता से क्यों नहीं बताता?

इसके कई कारण हो सकते हैं। उसे डांट का डर हो सकता है, उसे लग सकता है कि उसकी बात नहीं समझी जाएगी या वह अपनी भावनाओं को शब्दों में बताने में सहज न हो।

3. बच्चे से दोस्त की तरह बात करनी चाहिए?

बच्चे के साथ दोस्ताना और भरोसे वाला रिश्ता बनाना अच्छा हो सकता है, लेकिन माता-पिता की भूमिका और जरूरी सीमाएं भी बनी रहनी चाहिए।

4. बच्चा बात नहीं करता तो माता-पिता क्या करें?

उसे बार-बार सवालों से परेशान करने के बजाय उसके साथ समय बिताएं। खेलते, घूमते या साथ खाना खाते समय सामान्य बातचीत शुरू करना आसान हो सकता है।

5. क्या बच्चे की हर बात मान लेना जरूरी है?

नहीं। बच्चे की बात सुनना और उसकी हर बात मान लेना अलग-अलग चीजें हैं। उसकी बात समझने के बाद माता-पिता को उम्र और स्थिति के अनुसार सही फैसला लेना चाहिए।

आप भी अपनी बात साझा करें

क्या आपके बच्चे भी कभी-कभी अपनी बात आपसे नहीं बताते?

आपके अनुभव में बच्चे से खुलकर बात करने का कौन सा तरीका सबसे ज्यादा काम आया? नीचे कमेंट करके जरूर बताएं।

अगर आपको यह लेख उपयोगी लगा हो, तो इसे किसी ऐसे माता-पिता के साथ भी शेयर करें जिन्हें इसकी जरूरत हो सकती है।

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